The story of uttarakhand
नंदा की पुकार
कहानी शुरू होती है...
एक समय की बात है, भानियाल गांव में एक 17 साल की लड़की नंदा रहती थी। नंदा बचपन से ही थोड़ा अलग थी — वह पेड़ों से बातें करती, नदियों से खेलती और पहाड़ों की चोटियों से अकेले ही घंटों बात करती। गांववाले कहते थे कि उसमें "देवियों का वास" है
लेकिन एक रात कुछ अजीब हुआ…
पूरा गांव अंधेरे में डूबा हुआ था, आसमान में एक चमकती रेखा गिरी, और तभी जंगल की ओर से एक तेज़ रोशनी उठी। नंदा की आंखें अपने आप खुलीं और जैसे किसी शक्ति ने उसे खींचा हो, वह अकेले ही जंगल की ओर निकलकिन एक रात कुछ अजीब हुआ…।
जंगल का रहस्य
जैसे ही वह जंगल में पहुंची, उसने एक प्राचीन मंदिर को देखा — नंदा देवी मंदिर, जो सदियों से बंद था। मंदिर के द्वार अपने आप खुल गए। अंदर एक पत्थर की मूर्ति थी, जिसके आंखों से दूध की धार बह रही थी। तभी एक रहस्यमयी आवाज़ गूंजी —
"नंदा... तु ही अगली रक्षक है।"
मूर्ति से एक दिव्य रौशनी निकली और नंदा के शरीर में समा गई। उसके बाद वह बेहोश हो गई।
भविष्य की रक्षक
जब नंदा जागी, वह अब साधारण लड़की नहीं थी। उसके पास अब वो शक्ति थी जिससे वह पेड़ों की भाषा समझ सकती थी, हवा से संदेश ले सकती थी और बर्फ की चोटियों को भी पहचान सकती थी। अब वह केवल गांव की नहीं, पूरे हिमालय की रक्षक बन गई थी।
हर बार जब गांव पर कोई संकट आता — भूकंप, भू-स्खलन, बर्फीला तूफान — नंदा अपनी शक्ति से सबको बचा लेती।
लोगों ने उसे "देव-कन्या नंदा" का नाम दिया।
कहते हैं आज भी जब मंदाकिनी की लहरें तेज़ होती हैं और जंगल में बुरांश का फूल खिले बिना झड़ जाए, तो समझ लेना — नंदा अब भी जाग रही है, पहाड़ों की रक्षा में।
सीख:
कभी-कभी प्रकृति खुद किसी को चुनती है, अपनी रक्षा के लिए। उत्तराखंड सिर्फ पहाड़ों की भूमि नहीं, बल्कि रहस्यों और चमत्कारों की भूमि भी है।
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